Tuesday, December 6, 2011

bombay

कथा-यात्रा
.... ये है बाम्बे मेरी जान
-कमल

बचपन में देखी बंबइया (बालीवुड) फिल्मों का मेरे बालमन पर पड़ा डरावना प्रभाव ही था संभवतः जो कभी भी मुंबई जाने की नहीं सोची। तब की फिल्मों में बच्चों का अपने माता-पिता से बिछड़ जाना और बच्चों के हाथ-पांव काट कर उनसे भीख मंगवाने वाले गिरोह के चंगुल में पड़ जाना, फिल्मों का बहुत ही प्रिय विषय रहता था। फिल्म वाले तो अपनी फिल्में हिट करवाते रहे और मेरे जैसों के मन में मुंबई का डर जमा होता रहा। कुछ इस तरह कि बड़े होने और यह बात जानने के बावजूद कि वे सब फिल्मी कहानियों की बातें हैं, मन कभी भी मुंबई जाने की बात से सहज नहीं होता था। इसलिए जब-जब आदरणीय पी.जे.जगदले जी ने मुंबई घूमने का न्योता दिया तो मैं डरता रहा और काम का बहाना बना कर हर बार उन्हें टालता रहा। वे हर बार मेरे किसी अगली तिथि को आने की बात पर टलते रहे। यह तो है ऐतिहासिक कारण दरअसल मेरे टालने का एक तात्कालिक कारण भी था। मुंबई जाने वाली ट्रेन आधी रात के बाद टाटानगर (जमशेदपुर) से मिलती थी, अब आधी रात को ट्रेन पकड़ना, मेरे जैसे आलसी के लिए तो असंभव ही था ना!
लेकिन आमंत्रण देने और फिर टल जाने के लगातार क्रम से आखिर उनका धैर्य भी तो चूकना था।
दिसंबर में उन्होंने फोन किया, ‘‘क्या यार अब तो अपन अप्रैल में रिटायर होने वाला है। जब अपन ही मुंबई छोड़ देगा तब तुम्हारा प्रोग्राम बनेगा क्या? ...... ’’
शायद वे और भी कुछ सुनाने के मूड में थे। लेकिन मैंने तुरंत ही कहा, ‘‘ नहीं ,नहीं इस बार मैं आपकी मुंबई देखने जरुर आ रहा हूं।’’
‘‘ पक्का ?’’ उन्हांने पूछा।
‘‘ हां पक्का !’’ मैंने उत्तर दिया।
पक्का कह देने का परिणाम यह हुआ कि इस बार मैंने सचमुच गंभीरता से विचार कर अंततः मुबई जाने का मन बना ही लिया। क्योंकि पिछले दिनों ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस ट्रेन पर हुए नक्सली हमले के कारण टाटा नगर से हो कर रात्रि में ट्रेनों के चलने पर रोक लगी हुई थी। उन दिनों अपने सफर पर निकली हर ट्रेन वहीं रुक जाती, जहां उसे रात हो जाती थी। परिणामतः आधी रात को मुंबई जाने वाली ट्रेन टाटा नगर से सुबह आठ बजे जाने लगी थी। तो इस प्रकार मैंने मुंबई का टिकट कटा ही लिया। मुझे अपनी मनपसंद, ऊपर वाली बर्थ मिली। मैं ऊपर वाली बर्थ को इस कारण पसंद करता हूँ कि उस पर दिन में भी लेट कर आराम से पढ़ा जा सकता है। तो नियत दिन पर सुबह का नाश्ता कर स्टेशन पहंचने तथा ट्रेन चढ़ने मे कोई असुविधा नहीं हुई।
... और मैं उस बंबई उर्फ मुंबई की ओर चल पड़ा जो बचपन से ही अपने यहां बनी फिल्मों से मुझे डराती रही थी, आकर्षित करती रही थी। जहां मुंबा देवी का प्रसिद्ध मंदिर था, जहां के संतों और वीरों ने भारतीय इतिहास रचा था, जहां गेटवे आफ इंडिया था। जहां हाल ही में आतंकवाद का शिकार हुआ ताज होटल था, और भी न जाने क्या, क्या .... लेकिन इन सब के साथ और इन सब के बावजूद वह बाम्बे ....बंबई ....मुंबई थी। पूरी तरह से सजग, जीवंत, और सबके सपनों, अरमानों को पूरा करने में सक्षम।
प्लेटफार्म पर जगदले जी को देख कर मुझे असीम प्रसन्नता हुई। स्टेशन से बाहर निकलते हुए मैंने ध्यान दिया उन्हें बांया पैर उठाने में कुछ तकलीफ हो रही थी।
‘‘अरे कूछ नई यार। डाक्टर बोला, अपन के पैर का हड्डी थोड़ा बढ़ गया है।’’ मराठा-हिन्दी वाले उच्चारण में उनका उत्तर वैसा ही जीवंत था, जैसा छः -सात वर्ष पूर्व दिल्ली में था।
बाहर निकलते ही उन्होंने बताया, ‘‘अब्भी तो ये स्टेशन को वल्र्ड हेरिटेज का दर्जा मिल गया है। अंग्रेजों का विक्टोरिया टर्मिनस (वी.टी.) और आजाद भारत का छत्रपति शिवाजी (सी.एस.टी.)’’ मुझे वहां खड़ा कर फोटो खींचने के बाद बाहर निकलने पर मुंबई नगर पालिका (बी.एम.सी.) का विशाल भवन दिखाते हुए बताया, ‘‘मुंबई अटैक में वहीं पे उग्रवादी गोलियां चलाते थे।’’
हम पास में ही स्थित बस पड़ाव तक पहुंचे। डबल डेकर ट्रेन में तो मैं बहुत पहले धनबाद से कलकत्ता तक की यात्रा में बैठ चुका था, लेकिन डबल डेकर (दो मंजिला) बस में पहली बार मुंबई में ही बैठा। स्टेशन से घर तक पहुंचने में कोई बीस मिनट लगे होंगे। रास्ते में मुंबई हाईकोर्ट तथा विश्वविद्यालय के भवन भी देखे। अपने आदरणीय मित्र जगदले जी के साथ मेरा मुंबई-दर्शन प्रारंभ हो चुका था। उनके बारे में एक बात बताता चलूं, ये वही जगदले हैं जिनके बारे में मेरी कहानी ‘पिन्ने काणाम्’ में जिक्र है।
वहां मैदान में अपना बैग रख कर फोटो खींचने के क्रम में कई बार मुड़ कर अपना बैग देख चुका था। क्योंकि बचपन में देखी फिल्मों में कई बार ऐसे दृश्यों में पीछे से सामान गायब होते देखा था। तब सामान गायब होते ही फिल्मी बाम्बे में मुसीबतें शुरु हो जाती थीं। मगर मेरा बैग हर बार सुरक्षित था।

घर पर श्रीमती जगदले से मिलने पर लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहा हूँ।
उन्होंने मुस्कान के साथ बताया था, ‘‘ये तो आपकी इतनी बातें करते रहते हैं कि हम लोग आपसे मिले बिना ही आपको जानते हैं।’’
सागर तट पर बने शानदार होटल मरीन प्लाजा के ठीक पीछे स्थित उनके विशाल फ्लैट में चाय पीते हुए सबसे पहले सागर के रास्ते वर्ली को बांद्रा से जोड़ने वाले सी-लिंक (पुल) देखने का प्रोग्राम बन गया, ‘‘आज तो सिर्फ यही देखना होगा, तुम इतना कम समय लेकर आये हो।’’ उन्होंने शिकायती स्वर में कहा।
नीचे उतरने पर उनका बेटा श्रीपाद कार ले कर हमारे सामने था।
पौराणिक काल में राम की सेना ने समंदर पर सेतु निर्माण किया था। अब आधुनिक काल के इंजीनियरों द्वारा निर्मित सी-लिंक अद्भुत है। मुझे स्मरण हुआ करोड़ों की लागत से बने इस पुल के उद्घाटन का समाचार टी.वी. पर देखा था।
अंडाकार पथ पर बने पुल (सी-लिंक) पर गाड़ी ज्यों-ज्यों आगे बढ़ रही थी, लग रहा था मानों हम समुद्र के भीतर घुसे जा रहे हैं, वह भी नाव नहीं कार पर। यह अनुभव तब तक बना रहा जब तक कि कार मुड़ कर पुनः बांद्रा की ओर नहीं बढ़ने लगी।
मेरा मन कर रहा था कि वहीं कहीं कार रोक कर उतर जाएं और उस ऊँचाई से घंटों सागर को देखते रहें। लेकिन उस पुल पर कहीं भी रुकने की मनाही है। एक बार शुल्क की टिकट ले कर उस पर चल पड़ो तो फिर उस पार उतर कर ही अपनी गाड़ी रोक सकते हो।
मन का मन में ही रह जाने के शायद ऐसे ही किसी समय किसी शायर ने लिखा होगा, ‘दिल ढंूढता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन.....’
श्रीपाद ने बताया, ‘‘सी-लिंक के रास्ते चार मिनट की यह दूरी सड़क के रास्ते तय करने में घंटा भर लग जाता है। अगर कहीं ट्रैफिक जाम हो गया तो वह घंटा न जाने कितने घंटों का हो जाए ....।’’
‘‘... तो इस पुल ने मुंबई वासियों के पहले से ही तेज जीवन की स्पीड और बढ़ा दी है।’’ मैंने टिप्पणी की।
सी-लिंक पर वर्ली से बांद्रा तक जा कर लौटने में ही शाम घिर आयी थी। मैं भीतर ही भीतर छटपटा रहा था, मुझे तो सागर का आकर्षण अपनी ओर बुला रहा था।
‘‘क्या हम लोग थोड़ी देर सागर तट पर टहलें?’’ मैंने अपनी उत्सुकता दबा न सका।
‘‘थोड़ी देर क्यों अब्भी अपन पूरा घूमेंगे न!’’ जगदले जी ने श्रीपाद को समझाया कि हमें कहां उतारे।
गिर गाँव चैपाटी पर हमें श्रीपाद उतार कर घर चला गया था। मेरे ठीक सामने अरब सागर लहरा रहा था। हम दोनों, मैं और जगदले जी अब अकेले थे और हमारे सामने था, अकेला विशाल, अनंत सागर। जिसका पानी न जाने कहां-कहां जाता रहता है। किस-किस देश, किस-किस तट। किस-किस ऋतु, किस-किस मौसम। जो पृथ्वी के प्रारंभ से अब तक सदा सर्वदा से यहीं है .... जिसने न जाने कितने सृजन और विनाश देखे हैं। अगर वह बोल सकता तो हमें न जाने क्या-क्या बता देता। तभी मेरे भीतर से मानों किसी ने कहा हो सागर तो सभी कुछ बताता है, बस उसकी भाषा जान लो। मैं बेहद रोमांचित था। देश का पूर्वी किनारा अर्थात् बंगाल की खाड़ी का जल छू चुका था और अब पश्चिमी किनारे पर अरब सागर मेरे सामने फैला हुआ था। चैड़, रेतीले किनारे से आगे बढ़ कर हम समंदर के पानी के पास पहुंचे। जैसे कि मत्था टेका जाता है, मैंने आहिस्ते से बैठ कर पानी को अपने हाथ से छू लिया। वह एक अजीब-सी अनुभूति थी, जिसे मैं आज तक शब्द नहीं दे पाया हूं। मगर वह थी बड़ी अनोखी ..... शब्दातीत। मैं बहुत देर तक मूक बना समंदर को देखता रहा।
‘‘कमल, किधर को खो गये ?’’जगदले जी ने मुझे टोका।
‘‘देख रहा हूं, समंदर कितना शांत है।’’
कुछ सोचते हुए वे बोले, ‘‘हां, अब्भी तो शांत है। लेकिन इसमें हलचल होने पर, उन चट्टानों को दूर सड़क पर उछाल देता है।’’
मैंने मुड़ कर चट्टानों को देखा। खास तरह के शंक्वाकार आकार में तराशी गयी वे चट्टानें कोई पांच से दस टन के बीच होंगी और वहां से सड़क की दूरी बीस फीट से कम क्या होगी। मेरी हैरानी की सीमा ना थी, ‘‘इतनी भारी चट्टानों को उतनी दूर फेंकने के लिए तो समंदर को बहुत क्रोधित होना पड़ता होगा।’’
‘‘शायद तुम ठीक ही कहते हो। हमारे क्रिया-कलापों से न जाने समंदर क्या-क्या झेलता होगा ?’’ जगदले जी ने उत्तर दिया। फिर एक तरफ बढ़ते हुए बोले, ‘‘चलो भुट्टा खाया जाए।’’
मुझे भुट्टा खाना बहुत पसंद नहीं है, मैंने टालते हुए कहा, ‘‘मुझे नहीं खाना, आप खाइए।’’
‘‘अरे खाओ न, अपन भी कोई खास पसंद नहीं करता। ऐसा करते हैं एक ले लेते हैं।’’
हम दोनों भुट्टे वाले के पास खड़े हो गये। छोटी-सी रेहड़ी पर एक तरफ अंगीठी जल रही थी। जिसे चारों तरफ से अच्छी तरह घेरा हुआ था, वर्ना वहां चलती तेज हवा में भुट्टा भले ही न भुने उसकी आग चारों तरफ जरुर फैल जाएगी। भुना भुट्टा लेते हुए जब उसे पैसे देने पड़े तो मैं हैरान रह गया। एक भुट्टे का मूल्य बीस रुपये! यानि कि हमारे यहां से चार गुना मंहगा।
‘‘अब समझे, अपन भुट्टा क्यों खिलाना चाहता था?’’ भुट्टे वाले को पैसे दे कर जगदले जी ने हंसते हुए उसके दो टुकड़े किये और एक मेरी तरफ बढ़ाया।
भुट्टा भुनने के क्रम में चारों ओर देखते हुए जिस एक बात पर मेरा ध्यान अटका था, वह थी कुछ लोगों द्वारा अपने हाथों में पकड़ी कई-कई चटाईयां। भला इतनी चटाइयां लेकर वे क्यों आये हैं? उसका उत्तर मुझे जल्द ही मिला। एक लड़का हमारी ओर आया था, ‘‘चटाई साब ?’’
‘‘क्यों, कहीं बैठना है? बैठना हो तो इससे चटाई ले लेते हैं।’’
‘‘नहीं मुझे तो घूमने में आनंद आ रहा है।’’ मैंने जगदले जी को बताया।
‘‘साब, सिर्फ बीस रुपये घंटा का रेट है।’’ चटाई वाले ने फिर कहा।
‘‘अरे वाह! चटाई से भी धंधा!’’ मैंने व्यापार के उस रुप को देख कर प्रणाम किया।
‘‘हो (हां), अब घर से चटाई ढो कर कौन लाए।’’ जगदले जी मुझे बता रहे थे।
़ऊपर आसमान पर हवाई जहाजों का आना-जाना लगा था। उन्हें दिखाते हुए वे बोले, ‘‘उधर ऊप्पर से देखो तो मरीन ड्राईव के आजु-बाजु की लाइटें समंदर के किनारे होने से गले का हार जैसी दिखती हैं। इसको विक्टोरिया‘ज नेकलेस कहते हैं।’’
बातें करते-करते हम दोनों नारीमन प्वाइंट की ओर बढ़ रहे थे। चारों तरफ भीड़ थी। जिसमें हर उम्र, हर वर्ग, हर प्रकृति के लोग थे। बच्चे पूरे उत्साह में खेल-कूद कर रहे थे, तो बड़े अपनी-अपनी बातों में लगे हुए थे। बुजुर्ग ढलती शाम के साथ न जाने अपने जीवन की कितनी शामों को याद कर रहे होंगे। मैं अपने पहली बार मुंबई में होने को अधिक से अधिक अपनी आंखों में समा लेना चाहता था। उस रेतीले तट पर गुब्बारे, भुट्टे, मूंगफली के छोटे विक्रेताओं से लेकर इटली-डोसा, कोल्ड ड्रिंक्स आदि के छोटे होटल भी मौजूद थे। वहां की चहल-पहल देख कर यही लग रहा था कि हर शाम वहां मेला लगता है।
हम दोनों काफी देर तक समुद्र तट पर टहलते रहे। उसके बाद मैरीन ड्राईव पर आ गये। रात गहराती जा रही है, इस बात की गवाही मुंबई तभी देता है, जब समंदर की तरफ देखा जाए या फिर आसमान की तरफ, वर्ना तो इस शहर में कभी अंधेरा नहीं होता। दिन में प्राकृतिक सूर्य चमकता है तो रात में कई-कई बिजली के सूरज। मैरीन ड्राईव के शहर वाली तरफ नहीं, सागर वाली तरफ का किनारा पक्के, ऊंचे चबूतरे जैसा है। साफ-सुथरा और समतल, उस पर लेट भी जाओ तो कोई असुविधा नहीं होती। मैं पाल्थी मार कर बैठते हुए समंदर के पानी पर से हो कर आती हवा की शीतलता को महसूस करने लगा।
तभी न जाने कहां से तेल की शीशी हाथ में पकड़े एक शख्स प्रकट हुआ और जगदले जी से बातें करने लगा। उनकी बातों का अंदाज ही बता रहा था कि वे पूर्व परिचित हैं। जगदले जी की मालिश होने लगी। अच्छी तरह मालिश कर वह जब जाने लगा तो जगदले जी ने उसे रोकते हुए कहा, ‘‘अब्भी रुक्को न। ये अपन का दोस्त बहुत दूर से आया है। इसको भी चम्पी करने का।’’
‘‘अच्छा आपका दोस्त है!’’ कह कर वह मेरे सर में भी तेल मलने लगा। उसके हाथ सधे हुए तरीके से चल रहे थे और उसकी बातें बदस्तूर जगदले जी से चल रही थीं। थोड़ी ही देर में मुझे उसकी कला का कायल होना पड़ा। लंबी रेल यात्रा से सर में उपजा भारीपन न जाने कहां गायब हो गया।
घर लौटने तक गर्मी और प्यास से मेरा गला सूख रहा था। बाथरुम से हाथ-मुंह धो कर निकला तो जगदले जी ने मुझे भी डायनिंग टेबल पर ही बुला लिया। मैंने पानी के जग की ओर हाथ बढ़ाया तो जगदले जी ने मुझे रोक दिया, ‘‘अरे यार इतनी गर्मी और प्यास के बाद पानी नहीं पीने का।’’
मैंने हैरानी से उनकी ओर देखा। मेरी आंखों के प्रश्न को पढ़ कर वे बोले, ‘‘बियर है न!’’
सच कहूं तो बियर का नाम सुन कर मैं बड़ा प्रसन्न हुआ। मैंने कहा, ‘‘पहले पानी तो पी लूं।’’
‘‘नहीं, नहीं। पहले पानी नहीं, बीयर पीने का। पानी नहीं!’’ कहते हुए उन्होंने दो ग्लासों में बियर ढाल कर एक मेरी ओर बढ़ाया।
कंठ सुखाने वाली उतनी प्यास में ठंढी बियर पीना मेरे लिए पहला अनुभव था और अप्रतिम भी। मेरी उस राय पर जगदले जी घनी मूँछों के नीचे से हल्का-हल्का मुस्करा रहे थे।
थोड़ी देर में श्रीपाद ने आ कर मराठी में अपने पिता को न जाने क्या कहा। मगर उसकी नजरें मेरी तरफ ही थीं जिससे मैंने अनुमान लगा लिया कि मेरे बारे में बात है। मैंने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है?’’
‘‘लो अब खुद से पूछ लो।’’
पिता की बात पर श्रीपाद ने अटकते हुए कहा, ‘‘वो अपन का कुछ दोस्त लोग आपसे मिलना चाहते हैं।’’
मैं बुरी तरह चैंका। मैं पहली बार मुंबई आया हूं और यहां मुझे कोई भी नहीं जानता फिर उसके युवा दोस्त मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं? मेरी दुविधा को उसी ने दूर किया, ‘‘.... वो बोले तो अंकल आपकी कहानियों के मराठी ट्रांसलेसन उन्होंने पढ़े हैं। मैं उनको बोला था, आप आने वाले हैं। इसीलिए वे मिलने को आये हैं। ’’
यह मेरे लिए किसी सुखद आश्चर्य से कम न था। अपने पाठकों से मिलना भला किस लेखक को अच्छा नहीं लगता! वह शाम मेरे जीवन की एक अविस्मरणीय सौगात बन गई थी। हम सब एक साथ खाना खाते और बातें करते रहे।
अगली सुबह जगदले जी के साथ कन्हेरी की बौद्ध गुफाएं देखना तय हुआ था। लेकिन मन का सोचा हर बार कहां हो पाता है? मुझे तो भेर में पता चला था। संभवतः आधी रात के बाद उनके घर से फोन आया था कि जगदले जी की बड़ी भाभी का देहांत हो गया है। श्रीपाद मेरे पास रुक रहा था और वे दोनों, पति-पत्नी, भोर में निकल रहे थे। मैं वहां न होता तो संभवतः श्रीपाद भी उनके साथ जाता।
मैंने कहा था, ‘‘आप श्रीपाद को भी साथ ले लें, मेरा मुंबई घूमना उतना जरुरी नहीं है।’’
‘‘अरे कूछ नईं यार, तुम आराम से घूमने को। श्रीपाद सब घुमायेगा।’’ कहते हुए जगदले कार में बैठ गये।
दिन निकला और नियत समय पर हम तीन (मैं, श्रीपाद और जगदल जी के एक मित्र) राष्ट्रीय पार्क स्थित कन्हेरी की बौद्ध गुफाएं देखने निकल पड़े।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.), मुंबई मंडल द्वारा इन गुफाओं को अंतर्राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित कर दिया गया है। वहां की पहाडि़यों पर लगभग एक सौ दस गुफाएं हैं। जिनमें गुफा सं.-3, 11, 34, 37, 85 तथा 90 काफी महत्वपूर्ण हैं। उन गुफाओं के सामान्य विन्यास में एक मुख्य गर्भ गृह, बाहरी बरामदा व सीढि़यां आदि की व्यवस्था की गई है। गुफाओं में आकर्षक बुद्ध प्रतिमाएं भिन्न-भिन्न मुद्राओं में प्रदर्शित की गई हैं। हीनयान संप्रदाय का प्रतिनिधित्व करती उन गुफाओं में स्तूप, बोधी वृक्ष, पद-चिह्न प्रमुखता से बने हुए हैं। दीवारों के दोनों ओर जमीन के नीचे विशाल जल कंड बनाये गये हैं जिनमें वर्षा का जल संचित करने के प्रबंध हैरान करने वाले हैं। उस काल में वहां ऊँची पहाड़ी पर रहने वालों को पानी की कमी कभी नहीं होती होगी।
राष्ट्रीय जैविक उद्यान में सबसे बुरा अनुभव रहा सफारी पर चलना। दरअसल जब से जुरासिक पार्क फिल्म देखी है तब से सफारी पर जाने से पहले ही हमारी अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। फलतः हमें निराश होना पड़ता है। लेकिन वहां निराशा का कारण टिकट लेने से बस की प्रतीक्षा करने और उस पर चढ़ने तक में फैली कुव्यवस्था थी। यही लगता रहा कि सफारी पर ना चढ़ता तो राष्ट्रीय जैविक उद्यान के बारे में ज्यादा अच्छी राय बना पाता।
वहां से निकलते ही जगदले जी के मित्र ने हमसे विदा ली और मैं तथा श्रीपाद आरबिट माल की ओर चल पड़े जहां फिल्म निर्देशक श्री मनीष खंडेलवाल जी ने मिलने के लिए समय नियत कर रखा था। श्री मनीष खंडेलवाल ने पांच-दस मिनटों की कुछ कलात्मक और बहुत ही अच्छी फिल्में बनाई हैं।
रात होने तक हम वापस घर लौट आये थे। अगले दिन हम दोनों ने एलिफेंटा गुफाएं देखने जाना था। और वह अगला दिन वेलेंटाइन डे था। पिछले कुछ वर्षा से इसके मनाने वालों और विरोधियों ने मिल-जुल कर इसे खासा हंगामेदार बना रखा है।
‘गेट वे आफ इंडिया’ पहुंच कर पता चला कि उस दिन ए.एस.आई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) की साप्ताहिक बंदी होती है। हमं लगा एलिफेंटा गुफाएं तो बंद होंगी, अब लौटना पड़ेगा। लेकिन मेरे लिए समंदर पर फेरी की सैर का आकर्षण ही कुछ कम न था। तय हुआ कि भले ही गुफाएं बंद हैं, एलिफेंटा जा कर कुछ समय बिता लौट आएंगे। इसलिए टिकट ले कर हम फेरी (मोटर बोट) में जा बैठे। ताज होटल को पीठ पीछे रख कर मैंने भी कुछ फोटो खिंचवाए, लेकिन ताज को देखने का असल आनंद तो समंदर से मुड़ कर देखने में ही है। वहां से उसकी सुंदरता देखते ही बनती है।
यात्री, मालवाहक पोतों और सुंदर मोटरबोटों से सागर का सीना आबाद था। भारतीय नौसेना के पोतों को देख कर गर्व हो रहा था, हमारी जल सीमा के प्रहरी मुस्तैद थे। लगभग एक घंटे की समुद्री यात्रा के बाद हम ऐलिफेंटा द्वीप पर पहुंचे।
हम दोनों आपस में काफी खुल चुके थे, ‘‘ अरे यार, मुझे लग रहा है कहीं मैंने तुम्हारा वेलेंटाइन डे खराब तो नहीं कर दिया?’’
‘‘नहीं अंकल, ऐसी कोई बात नहीं।’’ उसने हंसते हुए कहा।
‘‘अगर ऐसी कोई बात है तो उसे अपने साथ ले आते। मैं थोड़ा इधर-उधर बैठ जाता।’’ मैंने उसे फिर टटोला।
‘‘नहीं अंकल ऐसी बात होती तो भी आपको हमारे साथ बैठाने में अपन को कोई परेशानी नहीं होती।’’ उसने ठहाका लगाया।

सारा दिन बिता कर शाम को हम दोनों जब घर पहुंचे, तब लगभग सभी खबरिया चैनल उस पड़ोसी देश के गायक की खबरों से लबालब थे, जो अपने साथ गैरकानूनी तरीके से नकदी भारत से बाहर ले जा रहा था। अपने सााि ले जाने की सीमा से अधिक नकदी में रुपये के साथ-साथ डाॅलर में भी थी। कस्टम द्वारा अब पकड़े जाने के क्रम में उसे अपने साथियों सहित हवाई अड्डे पर रोक लिया गया था। और फिर कि जैसा होता है इस तरह की खबरों के बाद वे चैनल कई-कई लोगों को बुला भेजते हैं, तथाकथित ब्रेकिंग न्यूज पर एक्सपर्ट कमेंट करने के लिए तो हमारे एक प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक उसका बचाव करते हुए कह रहे थे कि उसके सहायक के कारनामे का उस गायक को पता नहीं रहा होगा। वह गायक तो बड़ा भला मानस है, उसे नहीं पकड़ना चाहिए।
मेरे मन में विचार आया, तो कभी उसका सहायक अपने साथ बम ले जाए तब भी उसे पता नहीं हो सकता! और उसमें भी उस बिचारे का क्या दोष होगा ? कितनी मासूम वजह है! है न! क्या ऐसे सहायक साथ रखना ही दोष नहीं है ? ....... इसके साथ ही मुझे पिछले दिनों देखी फिल्म सरफरोश की याद आ गयी, जिसमें आमिर खान तथा नसीरुद्दीन शाह ने बढि़या अभिनय किया है। दोनों ही मेरे पसंदीदा कलाकार हैं।
मैं अगले दिन लौटने वाला था। वहां की कई यादों के साथ-साथ मुंबई की भेल, बड़ा-पाव, बटाटा बड़ा, पूरन पूरी, श्रीखंड की मिठास...... हर स्वाद मेरे साथ-साथ आने वाला था। सच में ही बड़ी अजीब है मुंबई। बहुत अमीर और बहुत गरीब दोनों ही वहां सहज मिल जाते हैं। जादूई, सपनों वाली, जिंदादिल और जीवंत है मुंबई। जब तक पी.जे.जगदले जैसे मराठा हैं, मेरे जैसे डरपोक भी बड़े आराम से मुंबई जाते रहेंगे .....।
मैंने वहां से पूना (पुणे) जाना था, जहाँ भाई कपूरचंद अग्रवाल जी (संपादक-समग्र दृष्टि) मेरी प्रतीक्षा में थे। उनसे भी पहली बार ही मिलना होने वाला था। कपूरचंद अग्रवाल जी से मिलना और पूना में क्या-क्या हुआ वह भी बहुत अनूठा है। वह सब फिर कभी .....!

-0-



(कमल)
डी-1/1 मेघदूत अपार्टमेंट, मरीन ड्राइव रोड कदमा; पो.-कदमा; जमशेदपुर-831005(झारखंड)।
फोन:- 09431172954. 0657.2310149
e-mail - kamal8tata@gmail.com
blog- kamalkikahaniyan.com